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Heart Touching Short Story In Hindi : कैंची और सुई

एक दिन किसी कारण से स्कूल में छुट्टी की घोषणा होने के कारण,एक दर्जी का बेटा, अपने पापा की दुकान पर चला गया ।
वहाँ जाकर वह बड़े ध्यान से अपने पापा को काम करते हुए देखने लगा ।
उसने देखा कि उसके पापा कैंची से कपड़े को काटते हैं और कैंची को पैर के पास टांग से दबा कर रख देते हैं ।
फिर सुई से उसको सीते हैं और सीने के बाद सुई को अपनी टोपी पर लगा लेते हैं ।
जब उसने इसी क्रिया को चार-पाँच बार देखा तो उससे रहा नहीं गया, तो उसने अपने पापा से कहा कि वह एक बात उनसे पूछना चाहता है ?
पापा ने कहा-बेटा बोलो क्या पूछना चाहते हो ?
बेटा बोला- पापा मैं बड़ी देर से आपको देख रहा हूं , आप जब भी कपड़ा काटते हैं, उसके बाद कैंची को पैर के नीचे दबा देते हैं, और सुई से कपड़ा सीने के बाद, उसे टोपी पर लगा लेते हैं, ऐसा क्यों ?
इसका जो उत्तर पापा ने दिया-उन दो पंक्तियाँ में मानों उसने ज़िन्दगी का सार समझा दिया ।
उत्तर था- ” बेटा, कैंची काटने का काम करती है, और सुई जोड़ने का काम करती है, और काटने वाले की जगह हमेशा नीची होती है परन्तु जोड़ने वाले की जगह हमेशा ऊपर होती है ।

यही कारण है कि मैं सुई को टोपी पर लगाता हूं और कैंची को पैर के नीचे रखता हूं……..!!

Inspirational Hindi Story : Jab Aap Dusre Ka Bhala Kar Rahe Hote Hai

एक बार श्री कृष्ण और अर्जुन भ्रमण पर निकले तो उन्होंने मार्ग में एक निर्धन ब्राहमण को भिक्षा मागते देखा अर्जुन को उस पर दया आ गयी और उन्होंने उस ब्राहमण को स्वर्ण मुद्राओ से भरी एक पोटली दे दी।
जिसे पाकर ब्राहमण ख़ुशी ख़ुशी घर लौट चला। पर राह में एक लुटेरे ने उससे वो पोटली छीन ली।
ब्राहमण दुखी होकर फिर से भिक्षावृत्ति में लग गया।
अगले दिन फिर अर्जुन की दृष्टि जब उस ब्राहमण पर पड़ी तो उन्होंने उससे इसका कारण पूछा।
ब्राहमण की व्यथा सुनकर उन्हें फिर से उस पर दया आ गयी और इस बार उन्होंने ब्राहमण को एक माणिक दिया।
ब्राहमण उसे लेकर घर पंहुचा और चोरी होने के डर से उसे एक घड़े में छिपा दिया। दिन भर का थका मांदा होने के कारण उसे नींद आ गयी, इस बीच ब्राहमण की स्त्री उस घड़े को लेकर नदी में जल लेने चली गयी और जैसे ही उसने घड़े को नदी में डुबोया वह माणिक भी जल की धरा के साथ बह गया।
ब्राहमण को जब यह बात पता चली तो अपने भाग्य को कोसता हुआ वह फिर भिक्षावृत्ति में लग गया।
अर्जुन और श्री कृष्ण ने जब फिर उसे इस दरिद्र अवस्था में उसे देखा तो जाकर सारा हाल मालूम किया।
सारा हाल मालूम होने पर अर्जुन भी निराश हुए और मन की मन सोचने लगे इस अभागे ब्राहमण के जीवन में कभी सुख नहीं आ सकता।
अब यहाँ से प्रभु की लीला प्रारंभ हुई।
उन्होंने उस ब्राहमण को दो पैसे दान में दिए।
तब अर्जुन ने उनसे पुछा “प्रभु मेरी दी मुद्राए और माणिक भी इस अभागे की दरिद्रता नहीं मिटा सके तो इन दो पैसो से इसका क्या होगा” ?
यह सुनकर प्रभु बस मुस्कुरा भर दिए और अर्जुन से उस ब्राहमण के पीछे जाने को कहा।
रास्ते में ब्राहमण सोचता हुआ जा रहा था कि”दो पैसो से तो एक व्यक्ति के लिए भी भोजन नहीं आएगा प्रभु ने उसे इतना तुच्छ दान क्यों दिया”?
तभी उसे एक मछुवारा दिखा जिसके जाल में एक मछली तड़प रही थी।
ब्राहमण को उस मछली पर दया आ गयी उसने सोचा”इन दो पैसो से पेट कि आग तो बुझेगी नहीं क्यों न इस मछली के प्राण ही बचा लिए जाये”यह सोचकर उसने दो पैसो में उस मछली का सौदा कर लिया और मछली को अपने कमंडल में डाल दिया।
कमंडल के अन्दर जब मछली छटपटई तो उसके मुह से माणिक निकल पड़ा।
ब्राहमण ख़ुशी के मारे चिल्लाने “लगा मिल गया मिल गया ”..!!!
तभी भाग्यवश वह लुटेरा भी वहा से गुजर रहा था जिसने ब्राहमण की मुद्राये लूटी थी।
उसने सोचा कि ब्राहमण उसे पहचान गया और अब जाकर राजदरबार में उसकी शिकायत करेगा इससे डरकर वह ब्राहमण से रोते हुए क्षमा मांगने लगा और उससे लूटी हुई सारी मुद्राये भी उसे वापस कर दी।
यह देख अर्जुन प्रभु के आगे नतमस्तक हुए बिना नहीं रह सके।

जब आप दूसरे का भला कर रहे होते हैं,
तब आप ईश्वर का कार्य कर रहे होते हैं।

Heart Touching Hindi Poem : लेकिन खोज के लाओ, पहले वो इन्सानी कुत्ते ..!

कोर्ट में एक अजीब मुकदमा आया,
एक सिपाही एक कुत्ते को बांध कर लाया.
सिपाही ने जब कटघरे में आकर कुत्ता खोला,
कुत्ता रहा चुपचाप, मुँह से कुछ ना बोला..!
नुकीले दांतों में कुछ खून-सा नज़र आ रहा था,
चुपचाप था कुत्ता, किसी से ना नजर मिला रहा था.
फिर हुआ खड़ा एक वकील ,देने लगा दलील,
बोला, इस जालिम के कर्मों से यहाँ मची तबाही है.
इसके कामों को देख कर इन्सानियत घबराई है,
ये क्रूर है, निर्दयी है, इसने तबाही मचाई है.
दो दिन पहले जन्मी एक कन्या, अपने दाँतों से खाई है,
अब ना देखो किसी की बाट,
आदेश करके उतारो इसे मौत के घाट…
जज की आँख हो गयी लाल,
तूने क्यूँ खाई कन्या, जल्दी बोल डाल..
तुझे बोलने का मौका नहीं देना चाहता,
लेकिन मजबूरी है, अब तक तो तू फांसी पर लटका पाता…
जज साहब, इसे जिन्दा मत रहने दो.
कुत्ते का वकील बोला, लेकिन इसे कुछ कहने तो दो,
फिर कुत्ते ने मुंह खोला ,और धीरे से बोला,
हाँ, मैंने वो लड़की खायी है,
अपनी कुत्तानियत निभाई है,
कुत्ते का धर्म है ना दया दिखाना,
माँस चाहे किसी का हो, देखते ही खा जाना.
पर मैं दया-धर्म से दूर नही,
खाई तो है, पर मेरा कसूर नही,
मुझे याद है, जब वो लड़की छोरी कूड़े के ढेर में पाई थी,
और कोई नही, उसकी माँ ही उसे फेंकने आई थी,
जब मैं उस कन्या के गया पास
उसकी आँखों में देखा भोला विश्वास,
जब वो मेरी जीभ देख कर मुस्काई थी,
कुत्ता हूँ, पर उसने मेरे अन्दर इन्सानियत जगाई थी.
मैंने सूंघ कर उसके कपड़े, वो घर खोजा था,
जहाँ माँ उसकी थी, और बापू भी सोया था,
मैंने भू-भू करके उसकी माँ जगाई,
पूछा तू क्यों उस कन्या को फेंक कर आई!!!?
चल मेरे साथ, उसे लेकर आ,
भूखी है वो, उसे अपना दूध पिला.
माँ सुनते ही रोने लगी,
अपने दुख सुनाने लगी,
बोली, कैसे लाऊँ अपने कलेजे के टुकड़े को!!?
तू सुन, तुझे बताती हूँ अपने दिल के दुखड़े को,
मेरी सासू मारती है तानों की मार,
मुझे ही पीटता है, मेरा भतार,
बोलता है लङ़का पैदा कर हर बार,
लङ़की पैदा करने की है सख्त मनाही.
कहना है उनका कि कैसे जायेंगी ये सारी ब्याही!!!
वंश की तो तूने काट दी बेल,
जा खत्म कर दे इसका खेल.
माँ हूँ, लेकिन थी मेरी लाचारी,
इसलिए फेंक आई, अपनी बिटिया प्यारी.
कुत्ते का गला भर गया,
लेकिन बयान वो पूरे बोल गया….!
बोला, मैं फिर उल्टा आ गया,
दिमाग पर मेरे धुआं सा छा गया.
वो लड़की अपना, अंगूठा चूस रही थी,
मुझे देखते ही हंसी, जैसे मेरी बाट में जग रही थी.
कलेजे पर मैंने भी रख लिया था पत्थर, फिर भी काँप रहा था मैं थर-थर.
मैं बोला, अरी बावली, जीकर क्या करेगी…!!?
यहाँ दूध नही, हर जगह तेरे लिए जहर है, पीकर क्या करेगी..!!?
हम कुत्तों को तो, करते हो बदनाम,
परन्तु हमसे भी घिनौने, करते हो काम.
जिन्दी लड़की को पेट में मरवाते हो,
और खुद को इंसान कहलवाते हो.
मेरे मन में, डर कर गयी उसकी मुस्कान
लेकिन मैंने इतना तो लिया था जान.
जो समाज इससे नफरत करता है,
कन्याहत्या जैसा घिनौना अपराध करता है,
वहां से तो इसका जाना अच्छा,
इसका तो मर जान अच्छा.

तुम लटकाओ मुझे फांसी, चाहे मारो जूत्ते,
लेकिन खोज के लाओ, पहले वो इन्सानी कुत्ते,
लेकिन खोज के लाओ, पहले वो इन्सानी कुत्ते ..!